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शिकायतों पर खामोशी,पंचायतों द्वारा गबन और खबरों का सच।

देश – प्रदेश।

गणतंत्र दिवस पर विशेष।

आजदी के बाद अनेक सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर जहां बहुत से परिवर्तन आये, वहीं पत्रकारिता के क्षेत्र में भी बहुत बड़ा बदलाव आया है,और पत्रकारिता ने उद्योग का स्वरूप ग्रहण कर लिया। कहा जा सकता है कि इस वजह से उद्योगों की समस्त अच्छाईयों के साथ इसको विकृतियां भी पत्रकारिता में आ गई है। जनता तक खबरें पहुंचाने वाले निष्पक्ष पत्रकारिता का पूरा आदर्श और ढांचा ही चरमरा गया है।

खबरें किसी उद्योग घराने के उत्पाद नहीं होते हैं लेकिन पिछले कुछ वर्षों से खबरों को एक उत्पाद बनाये जाने का खेल जारी है।

समाचार पत्र के रंगीन होते हुए पृष्ठ और उनमें विचार-शून्यता साफ झलकती है। विचारों और मुद्दों का भटकाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है   अखबार के पन्नों पर  न सिर्फ विचारों का अभाव है बल्कि उसके विपरीत चटपटी मसालेदार खबरें बहुतायत में प्रकाशित की जाने लगी है। अखबार के माध्यम से एक ऐसे स्वप्निल संसार का निर्माण किया जाने लगा है, जहां आम जनता को वास्तविकता से परे मात्र कलाबाजियां और चटपटी खबरों को पढ़ने  और वास्तविक मुद्दों से भटकाव की ओर धकेल दिया गया है, जबकि  देश की ९० प्रतिशत से अधिक जनता का इस प्रकार की खबरों से वास्तविकता में कोई सरोकार नहीं होता है।

आम जनता न्याय की उम्मीद में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की ओर आस लगाए अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने वालों की कलाबाजियां देखने के बाद भी न्याय की राह देख रही है।

Vikram
हां हम बहते हैं धारा के विपरित,लड़ते हैं भ्रष्टाचार की लहरों से। हम उठाते हैं आवाज आपके आस पास हो रहे अन्याय के खिलाफ। WhatsApp no - +919977769843 Any suggestions or comments.

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