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मां को वक़्त से पहले मत मारो।

नरसिंहपुर।
नमस्कार दोस्तों आज बरमान यात्रा के दौरान घाट पर मैं परिक्रमा वासियों के ठहरने स्थान पर पहुंचा वहां पहुंचने पर मुझे लगा शायद मेरी मुलाकात मां नर्मदा की परिक्रमा पर निकले भक्तों के समूह से होगी परन्तु जब मैंने वहां पर मौजूद लोगों से बात की तब स्थिति की गंभीरता का अंदाजा हुआ।
अनेक ऐसे वृद्ध जो आज भी अपने परिवार के होते हुए बरमान घाट पर अपनी मृत्यु का इंतजार कर रहे हैं यह देखकर मन ग्लानि से भर उठा।
एक अम्मा जी से जब बात की तब पता चला कि उनका घर बार, बेटे – बहू और भरा पूरा संपन्न परिवार है बहू घर में रहने नहीं देती और बेटे परिवार में शांति बनी रहे यह सोचकर अम्मा जी को दोबारा बरमान लेने नहीं आए ।अम्मा जी ने बताया कि बेटे बहुओं की शिकायत पर मार पिट करते थे अपना अंतिम समय तट पर गुजारकर बस मृत्यु का इंतजार कर रही है भोजन प्राप्त हुआ तो खा लिया वरना भूखे पेट ही जाना पड़ता है,भला हो होटल वाले सहृदय व्यक्ति का जो उन्हें भोजन करवा देता है।

आखिर यह कैसा समाज है क्यों जन्म देने वाली मां अपनी मृत्यु के अंतिम क्षणों में घाट पर भूखे पेट ठंड में ठिठुरते हुए समय गुजरते देख रही है।
क्या यही शिक्षा है क्या यही संस्कार है , कैसे यह समाज इतना निष्ठुर हो सकता है।

जो बहू आज अपमान कर रही है कल वह भी वृद्ध होगी और इसी समय चक्र का हिस्सा बनेगी तब क्या बरमान घाट पर अपनों के इंतजार में मृत्यु का इंतजार कर पाना आसान होगा ।
माफी चाहता हूं परन्तु जब एक मां कष्ट झेल कर अपने बच्चों का भविष्य संवारती है तब क्या बच्चों का फर्ज नहीं बनता अपनी मां के प्रति।

Vikram
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