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धर्म के नाम पर इंसानियत का खून क्यों।

नमस्कार।

आज एक बहुत ही संवेदन शील विषय पर एक छोटा सा लेख लिखने की आवश्यकता महसूस हो रही थी कि आज शिक्षित समाज दिशहीनता की ओर अग्रसर हो रहा है आखिर क्यों।

मानव जाती विकास की ओर अग्रसर है, परन्तु आज विकास के इस युग में  हम इंसानियत क्यों खोते जा रहे हैं,क्या आज की युवा पीढ़ी सिर्फ पैसों की होड़ में खोकर इंसानियत को भूलने लगी है, क्या धर्म की आड़ में इंसानियत मर चुकी है,आखिर कैसे हम भूल सकते हैं की धर्म के नाम पर बंटवारे से सिर्फ राजनैतिक दलों को फायदा पहुंचता है और आम इंसान मारा जाता है।

किसी भी धर्म में सबसे अधिक मानवता पर जोर दिया जाता है तब क्यूं मानवता छोड़ कर हम धर्म की आड़ लेकर वहशी दरिंदे बन जाते है कैसे कत्ल और बलात्कार को जायज ठहरा सकते हैं बेगुनाह आम नागरिक का क्या दोष होता है।

सोशल मीडिया पर भी धर्म के नाम पर  जाने क्या क्या पोस्ट कर दिया जाता है आखिर क्यों वैचारिक मतभेद उत्पन्न करने वाली पोस्ट पब्लिश की जाती है क्यों इंसानियत पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ क्या है,वैश्विक स्तर पर इंसानियत के नाते क्या किया जा सकता है,विश्व के तमाम देशों में गरीबी, अशिक्षा, भुखमरी ,कुपोषण, बलात्कार,नशे की बढ़ती लत,भ्रूण हत्या और बेरोज़गारी अनेक ऐसे मुद्दे है जो विचार करने योग्य है सुलझाने योग्य हैं समाज को इस दिशा में सोचना चाहिए।

राजनेता इन सब समस्याओं को सुलझाने में सक्षम नहीं हो होने पर आम जनता को धर्म के नाम पर भ्रमित रखते हैं,आम जनता भी मुख्य उद्देश्य से भटककर इंसनियत खो बैठती है।

विश्व का प्रत्येक धर्म मानवता सिखाता है और कैसे हम अपनी शिक्षाओं को भूल जाते हैं।मां के चरणों में स्वर्ग होता है या कहें मां के पैरों में जन्नत है तब क्यों मां को धर्मो में बाट कर एक दूसरे को अभद्र गालियां देते हैं क्या मां का भी धर्म होता है हिन्दू मां, ईसाई मां, सिक्ख मां धर्म कोई भी हो पर मां का पद सबसे ऊपर होता है और आप सब भूलकर मां को भी गलियों में घसीट लेते हो आखिर क्यों।बहन सिर्फ बहन होती है हिन्दू सिक्ख या इसाई नहीं फिर कोई कैसे धर्म की आड़ में बलात्कार को जायज ठहरा सकता है।

मानवता को जिंदा रहने दो,विचार और विकास के दौर में वहशी दरिंदों की हर चाल को नाकाम कर दो सभी धर्मों के सार मानवता है जब आप स्वामी विवेकानंद जी के वसुधैव कुटुंबकम् को समझ जाते हैं तब धर्म की परिभाषा समझ जाते हैं।

सभी धर्मो का समान सम्मान आवश्यक है परन्तु सम्मान की आड़ में अहम को पुष्ट कर आम जनता को भ्रमित कर आपस में द्वेष भाव फैलाना उचित नहीं है।

Vikram
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